सुख की कामना

एक गांव में अनिल नाम का एक व्यक्ति था । उसे अपने जीवन में बहुत सारी तकलीफ थी। रहे अपने जीवन से काफी मायूस था और रहें इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता देख रहा था। किंतु उसे कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ रहा था एक दिन उसने सुना कि गांव में कोई सिद्ध महात्मा आए हुए हैं। उसने सोचा क्यों न महात्मा जी के पास अपनी समस्या का कोई समाधान पूछा जाए, यह सोच कर वहां महात्मा जी के पास चल पड़ा। महात्मा जी के पास जाकर उन्होंने कहा कि ” इस जीवन में बहुत से दुख है इन दुखों से बाहर निकलने का कोई रास्ता बताएं ।”

महात्मा जी ने सोचा कि इस व्यक्ति ने बहुत ही बड़ा प्रश्न पूछ लिया है और मन ही मन सोचने लगे कि यह जीवन दुखों का सागर है और हमें इन दुखों से आगे निकलना है वह भी इस दुख के सागर में रहते हुए। उन्होंने कुछ पल सोचा और उस व्यक्ति को कहा की तुम्हारे गांव में कोई भी व्यक्ति जो तुम्हें सुखी लगे तुम उसकी चप्पल यहां पर ले आना और उसके द्वारा मैं तुम्हें दुखों से निकलने का मार्ग बता दूंगा।

वह व्यक्ति झट से अपने गांव के लिए सुखी व्यक्ति की तलाश में निकल पड़ा। एक व्यक्ति बहुत ही सुखी नजर आ रहा था तो उसने उससे अपनी चप्पल देने के लिए कहा कि वह उन्हें कल लाकर दे देगा क्योंकि महात्मा जी ने उससे सुखी व्यक्ति के चप्पल लाने को कहा है। इस बात पर वह व्यक्ति बोला मैं तो अपने पड़ोसी से बहुत परेशान हूं मैं कहां से सुखी हूं।

इस प्रकार में बहुत से व्यक्तियों से मिला कोई अपने पिता से दुखी था कोई अपने पुत्र से दुखी था, कोई अपनी पत्नी से दुखी था, कोई अपने पति से दुखी था, कोई अपने बच्चों से दुखी था, कोई अपने व्यापार से दुखी था, कोई अपनी नौकरी से दुखी था, इस प्रकार हर व्यक्ति किसी ना किसी प्रकार से दुखी था । वह हताश होकर वापस गुरुजी के पास आ गया और गुरु जी को बोला की मुझे कोई भी सुखी व्यक्ति नहीं मिला।

इस पर गुरुजी मुस्कुरा दिए और कहा कि यह जीवन है दुखों का सागर यहां पर यदि सुख ढूंढना है तो अपने अंदर ही ढूंढना होगा। क्योंकि सुख तुम्हारे अंदर है यदि हमें प्रतिस्पर्धा भी करते हैं अपने आप से करो ताकि हम अपने आप को कल से बेहतर बना सकें यदि हम दूसरों से प्रतिस्पर्धा करेंगे तो हमें दुखी मिलेगा। हर व्यक्ति इस संसार में एक दूसरे से व्यवहार विचार से अलग होता है और यदि हम उनकी तुलना करते हैं तो हमें दु:ख मिलता है।

इस पर वह व्यक्ति गुरु जी को कहता है यह बात है मुझे पहले भी बता सकते थे। इस पर गुरु जी कहते हैं कि यदि यह बात मैं तुम्हें पहले बताता तो तुम्हें यह बात अच्छी नहीं लगती, क्योंकि अब तुम लोगों लोगों के माध्यम से जान चुके हो की कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं है, तो यह बात अब तुम्हें अच्छी लग रही है।

यह जीवन एक यात्रा है और हर व्यक्ति के जीवन का एक अलग किनारा है। सुखी वही है जिसने इस बात को जान लिया।

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